शनिवार, 29 जनवरी 2022

विभिन्न मांगों को लेकर 126 दिवसीय साचो आदिवासी तिरंगा यात्रा शुरू



मांगें नहीं मानी गई तो विधानसभा का घेराव के साथ ही होगा उग्र आंदोलन

नर्मदा। देश आजादी का अमृत महोत्सव वर्ष मना रहा है लेकिन आदिवासी समुदाया आज भी विकास की दौड़ में काफी पीछे हैं। सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने  73वें गणतंत्र दिवस पर गुजरात के नर्मदा जिला के आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण के लिए साचो आदिवासी तीरंगा यात्रा शुरू की गई है। भरुच जिला के झगड़ीया मत विस्तार के आदिवासी मसीहा के नाम से प्रख्यात छोटुभाई वसावा एवं नर्मदा जिला के डेडीयापाड़ा सागबारा मत विस्तार के लोकप्रिय विधायक महेशभाई वसावा ने गुजरात सरकार, केन्द्र सरकार व तमाम पार्टियों से अपील कि है कि आदिवासियो के हक व न्याय के लिए साचो आदिवासी तिरंगा यात्रा में शामिल होकर आदिवासियों को न्याय दिलाएं। यह यात्रा किसी पार्टी प्रेरित नहीं है बल्कि समाज के आदिवासी गरीब वर्गों को न्याय दिलाने की यात्रा है। यह यात्रा डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के संविधान के अनुरूप आदिवासी अपना हक चाहते हैं। किसी से भीख नही मांगते। उन्होंने कहा कि यदि हमारी मांग पर किसी ने संज्ञान नहीं लिया तो समस्त आदिवासी समाजअपने हक के लिये उग्र आंदोलन करेगा।



उन्होंने आदिवासियों की मांगों का उल्लेख करते हुए कहा कि तापी और नर्मदा का पानी हमारे क्षेत्र से गुजरात के स्वराष्ट्र में जाता है लेकिन आदिवासी क्षेत्र से निकलने वाले नहर के पानी से अगल-बगल के आदिवासी किसानों को वंचित रखा जाता है। गुजरात में दारूबंदी का हम समर्थन करते हैं लेकिन नकली दारू पीकर आदिवासी मर रहे हैं और औरतें विधवा व बच्चे अनाथ हो रहे हैं। क्या सरकार ने कभी इसके बारे में सोचा कि ऐसा क्यों हो रहा है। दरअसल, दारुबंदी के बावजूद प्रशासन व गुजरात पुलिस की शह पर हरेक गांव व तालुका में नकली दारू खुलेआम बिक रहा है। नकली दारू आदिवासीयों को शारीरिक-मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर रही है। नकली दारू पीकर लोगों की असमय मृत्यु हो रही है। आदिवासि युवाओं के खिलाफ यह एक गहरा षड्यंत्र है। अगर गुजरात सरकार ने इसका संज्ञान नहीं लिया तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। पूरे देश में 16 से 17 करोड़ और अकेले गुजरात में ही एक से डेढ़ करोड़ आदिवासी हैं।

बहरहाल, 73वें गणतंत्र दिवस से शुरू साचो आदिवासी तिरंगा यात्रा 126 दिनों तक गुजरात के समस्त आदिकासी क्षेत्रों में गुजरते हुए निकलेगी जिसका नेतृत्व झगड़ीया मत विस्तार के विधायक छोटुभाई वसावा व डेडीयापाडा-सागबारा के लोकप्रिय विधायक महेशभाई बसावा के नेतृत्व एवं मुख्य सलाहकार डॉ. के. मोहन आर्य कर रहे हैं। इस यात्रा में बीटीटीएस प्रमुख महेश जी बसावा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष परेश बसावा, पूर्व नर्मदा जिला कारोबारी अध्यक्ष बहादुरभाई वसावा, युवा सरपंच देवजीभाई वसावा नर्मदा जिला के उप प्रमुख जगदीश भाई वसावा (जगो) बीटीबी के अग्रणी कार्यकर्ता सागर के आर्य समेत हजारों कार्यकर्ता शामिल हैं। तिरंगा यात्रा में शामिल लोगों का कहना है कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर उचित विचार नहीं किया तो फिर उग्र आंदोलन किया जाएगा। साथ ही गुजरात विधान सभा के समक्ष 5 से 6 लाख आदिवासी धरना पर बैठकर विधानसभा का घेराव करेंगे। अब यह लड़ाई साचो आदिवासी तिरंगा यात्रा के बैनर तले मरते दम तक जारी रहेगा।

 

सोमवार, 10 मई 2021

के मोहन आर्य बने भारतीय ट्राइबल पार्टी के राष्ट्रीय सलाहकार


 


के मोहन आर्य बने बीटीपी के राष्ट्रीय सलाहकार

नई दिल्ली। गुजरात के प्रमुख सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता तथा भारत यात्रा केंद्र डेडियापाड़ा के संस्थापक के मोहन आर्य को भारतीय ट्राइबल पार्टी ने मुख्य सलाहकार नियुक्त किया है।  के मोहन आर्य ने अपने राजनीतिक यात्रा की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की छत्रछाया में शुरू की थी।भारतीय ट्राइबल पार्टी के संरक्षक व झगड़िया से विधायक छोटूभाई ए बसावा की सलाह पर पार्टी के अध्यक्ष व डेडीयापाड़ा से विधायक महेश भाई छोटू भाई बसावा ने के मोहन आर्य को पार्टी का राष्ट्रीय सलाहकार नियुक्त किया। इस नियुक्ति के बाद आर्य ने मीडिया से कहा कि वे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के आदर्शों पर चलते हुए आदिवासियों, दलितों व कमजोर वर्ग के लोगों के न्याय की लड़ाई अंतिम दम तक लड़ेंगे। 

सोमवार, 8 जुलाई 2019

देश का नया बही खाता


बद्रीनाथ वर्मा

न्यू इंडिया का वादा कर प्रचंड बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आई मोदी सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया है। सांकेतिक ही सही लेकिन गुलामी की परंपरा को खत्म करते हुए इसे देश का बही खाता नाम दिया गया। साथ ही देश की पहली महिला वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इसके लिए ब्रिफकेस के बजाय लाल कपड़े की फाइल का इस्तेमाल किया। देश के इस बही खाते का मुख्य फोकस किसान और गांव हैं। चूंकि वित्त मंत्री स्वयं भी महिला हैं इसलिए उन्होंने अपने पहले ही बजट में महिलाओं को बड़ी राहत दी है। जनधन खाताधारक महिलाओं को 5000 रुपए ओवरड्राफ्ट की सुविधा के साथ ही महिलाएं एक लाख रुपए तक मुद्रा लोन भी ले सकेंगी। अमीरों से लेकर गरीबों का कल्याण करने की नीति के तहत करोड़पतियों पर टैक्स की चपत पड़ी है। जिनकी आय 2 करोड़ से 5 करोड़ के बीच है, उन पर 3 फीसदी का अतिरिक्त सेस जबकि  5 करोड़ से अधिक की सालाना आय वालों पर 7 फीसदी का सेस ठोंका गया है। हालांकि मध्यम वर्ग को इस लिहाज से निराशा हो सकती है कि पुराने टैक्स स्लैब में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। इस बही खाते में स्टार्ट अप को बढ़ावा देने के लिए शुरुआती तीन साल तक आयकर से छूट के साथ ही शुरुआत में लगने वाले एंजल टैक्स से मुक्ति दे दी गई है। इसके अलावा उच्च शिक्षा पर नया मसौदा तैयार करने के लिए 400 करोड़ रुपये का बजट जारी करने के साथ ही नई शिक्षा नीति लाने की घोषणा तथा विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए अध्ययन  योजना का ऐलान साफ संकेत है कि सरकार का खासा ध्यान शिक्षा पर है। पिछली बार आयुष्मान भारत जैसी बड़ी योजना लागू करने वाली मोदी सरकार ने इस बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए किसी तरह की नई बात का जिक्र नहीं है।
बजट की एक खास बात यह है कि इसमें इलेक्ट्रॉनिक वाहनों पर जोर दिया गया है। इसके लिए छूट भी दी गई है। कई क्षेत्रों में सौ फीसदी एफडीआई का रास्ता खोले जाने व 100 से अधिक श्रम कानूनों की जगह सिर्फ चार तरह के कानून लाने की व्यवस्था निश्चय ही एक क्रांतिकारी कदम है। श्रम कानूनों में सुधार की पहल से पता चलता है मोदी सरकार ने उस कमजोर नस को पकड़ लिया है, जिसके चलते चीन से कई समानताएं होने के बावजूद उसके मुकाबले भारत मैन्यूफैक्चरिंग हब नहीं बन पाया। विशेषज्ञों के मुताबिक कई सरकारें आई गईं लेकिन कोई भी सरकार श्रम कानूनों में सुधार का साहस नहीं जुटा पाईं मगर मोदी सरकार ने इसे बदलने की पहल की है। निश्चय ही यह शुभ संकेत है। बहरहाल, आशा के अनुरूप ही सत्तापक्ष ने जहां बही खाते के कसीदे पढ़े वहीं विपक्ष ने इसकी मीन मेख निकालते हुए इसे नई बोतल में पुरानी शराब कहकर अपनी खीझ व्यक्त की है। इससे इतर प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी सराहना करते हुए कहा है कि इससे गरीब को बल मिलेगा, युवा को बेहतर कल मिलेगा। ये बजट 'न्यू इंडिया' के विजन को आगे बढ़ाता है। कुल मिलाकर की गई घोषणाओं के आधार पर अगर इसे संतुलित बजट कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।


लुटे पिटे-से केजरीवाल


बद्रीनाथ वर्मा

न भूतो न भविष्यति की तर्ज पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली छवि तार-तार हो चुकी है। नतीजा, 70 में से 67 सीटें जीतने वाली केजरीवाल की पार्टी उसी दिल्ली में कांग्रेस से भी पिछड़ गई है। आखिर क्यों? क्या इसे अन्ना आंदोलन की भ्रुण हत्या के रूप में देखा जा सकता है?


लोकसभा चुनाव में मत प्रतिशत के लिहाज से दिल्ली में तीसरे नंबर पर खिसक जाने के बाद पूरी आम आदमी पार्टी अंदर से हिली हुई है। तेजी से घटती लोकप्रियता को थामने के लिए हाथ पैर मार रही पार्टी इसके कारणों को तलाशने के बजाय महिलाओं को मेट्रो में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने जैसे लॉलीपॉप का सहारा ले रही है। जाहिर है यह पार्टी से दूर होती जा रही, आम जनता को पार्टी के प्रति विश्वास बनाये रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। सोचने वाली बात है कि जिस पार्टी को दिल्ली की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता सौंपी थी उससे आखिरकार जनता के मोहभंग का क्या कारण है। दरअसल, भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंककर सत्ता के शीर्ष तक पहुंची पार्टी ने न केवल भ्रष्टाचार में खूब नाम कमाया है। बल्कि चुनाव पूर्व किये गये नई राजनीति के वादों को बिसारकर उसी कांग्रेस से गठबंधन करने को बेताब दिखे, जो उनकी नजर में महाभ्रष्ट थी।
भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत होने का दावा करते हुए तब अरविंद केजरीवाल सत्ता में आने पर शीला दीक्षित को जेल भेजने की बात कहते थे। अपने बच्चों की कसम खाते थे कि वह कभी भी कांग्रेस से हाथ नहीं मिलायेंगे लेकिन बदलते वक्त में उनका एकमात्र एजेंडा सत्ता में बने रहने तक सीमित हो गया। अन्ना आंदोलन की कोख से उपजी आप का यह बदला स्वरूप दिल्ली की जनता को नहीं भा रहा। इसका उदाहरण चुनाव नतीजे हैं। अरविन्द केजरीवाल केंद्रित बन चुकी पार्टी के नेता हर उस आरोप में फंसे हैं जो आम आदमी पार्टी के संस्थापक सिद्धांतों के खिलाफ हैं। सैक्स स्कैंडल से लेकर भ्रष्टाचार तक। एक भी ऐसी गंदगी बाकी नहीं बची जिसका दाग इस पार्टी पर न लगा हो। ऐसे में इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जनता का उससे मोहभंग उसकी कथनी और करनी में फर्क का नतीजा है।

आम आदमी पार्टी आम जनता की कसौटी पर पूरी तरह से फिसड्डी साबित हुई है। इसे साबित करने के लिए किसी राकेट साइंस की जरूरत नहीं है। नगर निगम चुनावों व विधानसभा के उपचुनावों में मिली हार के बाद हालिया लोकसभा चुनाव के नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं। आएगा तो मोदी ही की तर्ज पर लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद आप की ओर से नया नारा गढ़ा गया है दिल्ली में तो केजरीवाल। यह नारा दिल्लीवासियों को कितना भायेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन आज की हकीकत तो यही है कि दिल्ली में अब आम आदमी पार्टी तीसरे नंबर पर खिसक चुकी है। कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भी अगर लोकसभा चुनाव का ही ट्रेंड जारी रहता है तो यह केजरीवाल की पार्टी के साथ खुद उनके सियासी वजूद पर भी गंभीर खतरा है। फिलहाल पार्टी दिल्ली में कांग्रेस के साथ नंबर दो की लड़ाई लड़ती हुई ही प्रतीत हो रही है।
अन्ना आंदोलन की कोख से उपजी आम आदमी पार्टी को मिली यह शानदार जीत दिल्लीवासियों के इस भरोसे का प्रतिबिंब थी कि यह पार्टी अन्य राजनीतिक दलों से अलग हटकर काम करेगी। लेकिन ऐसा हो न सका। जैसे जैसे वक्त बीता यह पार्टी भी आम से खास होकर उसी राजनीतिक सड़ांध का शिकार हो गई, जिसके खिलाफ वह लड़ने का दावा करती थी।
आम जनता के इस मोहभंग के कारणों को रेखांकित करते हुए देश के मूर्धन्य पत्रकार रामबहादुर राय का कहना है कि दिल्लीवासियों ने जिस उम्मीद के साथ केजरीवाल को समर्थन दिया था वह उस पर खरे नहीं उतर पाये। भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबी चौड़ी बातें सत्ता में आते ही रफूचक्कर हो गईं। लोकतंत्र व पारदर्शिता की वकालत भी कब की पीछे छूट चुकी हैं। केजरीवाल की न तो पार्टी में लोकतंत्र व पारदर्शिता की कोई जगह है और न ही उनकी सरकार में। नई तरह की साफ सुथरी राजनीति करने आये केजरीवाल ने जिस तेजी से रंग बदला उससे जनता निराश हुई। जिस कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का झंडा बुलंद किये हुए थी, उसी के साथ लोकसभा चुनावों में गठबंधन बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। जनता को उनका यह नया रूप बिल्कुल ही पसंद नहीं आया। कथनी करनी का यही फर्क उनके व उनकी पार्टी के पतन का कारण है।
बर्खास्त किए गए नेताओं की लिस्ट
योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार, कपिल मिश्रा और संदीप कुमार


उल्लेखनीय है कि लगभग साढ़े चार साल पहले अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने न भूतो न भविष्यति की तर्ज पर ऐसी ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी जिसकी दूर-दूर तक कल्पना नहीं की गई थी। वह भी तब, जब पीएम नरेंद्र मोदी ब्रांड मोदीके रूप में अपनी पूरी चमक के साथ सियासी फलक पर धूम मचाये हुए थे। एक के बाद एक लगातार राज्यों में विजय पताका फहराते जा रहे मोदी के रथ को केजरीवाल की नई नवेली पार्टी ने दिल्ली में रोक दिया था। न केवल रोका बल्कि दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर देश-दुनिया को चौंका दिया था। अन्ना आंदोलन की कोख से उपजी आम आदमी पार्टी को मिली यह शानदार जीत दिल्लीवासियों के इस भरोसे का प्रतिबिंब थी कि यह पार्टी अन्य राजनीतिक दलों से अलग हटकर काम करेगी। लेकिन ऐसा हो न सका। जैसे जैसे वक्त बीता यह पार्टी भी आम से खास होकर उसी राजनीतिक सड़ांध का शिकार हो गई, जिसके खिलाफ वह लड़ने का दावा करती थी।

             पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की लिस्ट

 आशुतोष, आशीष खेतान, मयंक गांधी, विशाल डडलानी, मेधा पाटकर, जीआर गोपीनाथ, अंजलि दमानिया, अलका लांबा, देवेंद्र सहरावत, अनिल वाजपेयी, गुरप्रीत सिंह

दिल्ली की सत्ता संभालने के बाद पार्टी लगातार ढलान पर है। चाहे नगर निगम के चुनाव हों या विधानसभा के उपचुनाव। लगातार हार ही मिली। रही सही कसर लोकसभा के चुनाव ने पूरी कर दी। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी दिल्ली की सात में से एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है। वैसे 2014 के आम चुनाव में भी आप को दिल्ली में कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी। हालांकि वह कांग्रेस को तीसरे नंबर पर धकेलने में कामयाब हुई थी। लेकिन इस बार मामला बिल्कुल उलट गया। दिल्ली की सातों की सातों सीटों में से किसी भी सीट पर पार्टी दूसरे नंबर पर भी नहीं आई। मतदान प्रतिशत के लिहाज से भी पार्टी तीसरे नंबर पर पहुंच गई है। पार्टी को लगभग 18 फीसदी वोट मिले हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस और पहले नंबर पर बीजेपी मौजूद है। इस नतीजे ने पूरी पार्टी को हिलाकर रख दिया है। कुछ ही महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए पार्टी हाथ पांव मार तो रही है लेकिन वह ऐसे भंवरजाल में फंस गई है जहां से निकल पाना फिलहाल संभव नहीं दिखता।
दिल्ली की सत्ता हासिल करने के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल ने पहला काम किया आंदोलन के साथियों को पार्टी से निकाल बाहर करने का। अरविन्द केजरीवाल ने उन लोगों को पार्टी से बाहर करना या उन्हें हाशिये पर भेजना शुरू किया जो उनकी सत्ता के लिए चुनौती साबित हो सकते थे। फिर चाहे वो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण हों या एडमिरल रामदास से लेकर प्रो. आनंद कुमार। ये सभी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे। एडमिरल रामदास तो पार्टी के आंतरिक लोकपाल थे।
उल्लेखनीय है कि अन्ना हजारे को ढाल बनाकर दिल्ली की सत्ता हासिल करने के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल ने पहला काम किया आंदोलन के साथियों को पार्टी से निकाल बाहर करने का। अरविन्द केजरीवाल ने उन लोगों को पार्टी से बाहर करना या उन्हें हाशिये पर भेजना शुरू किया जो उनकी सत्ता के लिए चुनौती साबित हो सकते थे। फिर चाहे वो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण हों या एडमिरल रामदास से लेकर प्रो. आनंद कुमार। ये सभी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे। एडमिरल रामदास तो पार्टी के आंतरिक लोकपाल थे। कहना गलत नहीं होगा कि पार्टी पर अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए केजरीवाल ने इसकी स्थापना काल से जुड़ने व जीत की व्यूहरचना करने वाले अपने पुराने साथियों को एक के बाद एक दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर कर दिया। बाद के दिनों में भी जिस किसी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री व आप संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आवाज उठाई उसे पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाने में जरा भी देर नहीं लगाई। कुछ को पार्टी ने बाहर किया तो कुछ ने खुद ही इस्तीफा देकर पार्टी से किनारा कर लिया। वैसे पार्टी में एक ऐसे भी नेता हैं, जिन्होंने न तो अभी तक पार्टी से इस्तीफा दिया है और न ही उन्हें पार्टी से निकाला गया है। लेकिन हां, उनका कद छोटा जरूर कर दिया गया है। कवि और राजनेता कुमार विश्वास भले ही आम आदमी पार्टी से अभी भी जुड़े हुए हैं, लेकिन उनका बागी तेवर बयां करता है कि वह दिल से इस पार्टी से कबके दूर जा चुके हैं। अपने ट्वीट के जरिए केजरीवाल को एकाधिक बार वह आत्ममुग्ध बौना कह चुके हैं।

                           ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह

केजरीवाल और उनकी पार्टी के सिपहसालारों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की एक लंबी फेहरिस्त है। हर आरोप को भाजपा की चाल बताकर इससे पल्ला झाड़ने की कला में पारंगत केजरीवाल सरकार पर लगे कुछ गंभीर आरोप

  • दिल्ली सरकार में जल मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने अरविंद केजरीवाल पर स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपये नकद लेने का आरोप लगाया था। मिश्रा का कहना था कि सत्येंद्र जैन ने जमीन सौदे के लिए 50 करोड़ रुपये की डील कराईजिसमें से ये रकम केजरीवाल को उनके घर पर दिए गए।

  • रोड्स एंटी करप्शन ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक राहुल शर्मा ने आरोप लगाया था कि सीएम केजरीवाल के साढ़ू सुरेंद्र बंसल ने कई फर्जी कंपनियों के जरिए सरकारी ठेके लिये। लेकिन बगैर कोई काम किये ही केजरीवाल के दबाव में सभी भुगतान आश्चर्यजनक ढंग से कर दिए गए। इससे सरकारी खजाने को 10 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। एसीबी ने सुरेंद्र बंसल के बेटे विनय बंसल को भी घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया था।

  • सुशील गुप्ता व एनडी गुप्ता को राज्यसभा टिकट दिये जाने को लेकर केजरीवाल पर आरोप लगा कि उन्होंने दोनों से 50-50 करोड़ लेकर टिकट दिया। इनमें से सुशील गुप्ता तो 40 दिन पहले तक कांग्रेस में थे। बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने केजरीवाल को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि वे अपना नार्को टेस्ट करवा लें। अगर अपने मुंह से खुद ना कहें कि 100 करोड़ में दो टिकट दिए तो मैं परिवार के साथ देश छोड़ कर चला जाऊंगा।

बहरहाल, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर सत्ता हासिल करने वाली केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार व घोटालों के कई गंभीर आरोप लग चुके हैं। भ्रष्टाचार का सबसे ताजातरीन मामला है दिल्ली के स्कूलों में कमरों के निर्माण में हुए दो हजार करोड़ रुपये के घोटाले का। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के बेटे व दिल्ली भाजपा प्रवक्ता हरीश खुराना की सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से खुलासा हुआ है कि स्कूलों के जो कमरे 892 करोड़ रुपये में बनाए जा सकते थे। उनके लिए 2892 करोड़ रुपये खर्च किये गये। यानी 2000 करोड़ की सीधी लूट। यही नहीं, जिन 34 ठेकेदारों को टेंडर दिये गये उनमें से कुछ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के रिश्तेदार या उनके जानने वाले हैं। इस खुलासे के बाद स्कूलों को चमका देने की डींग हांकने की हकीकत भी अब बेपर्दा हो चुकी है।
घोटाले में केजरीवाल व सिसोदिया की संलिप्तता का आरोप लगाते हुए दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने उनके इस्तीफे की मांग की। तिवारी ने कहा कि केजरीवाल सरकार कहती है कि उसने शिक्षा में बड़ा काम किया है लेकिन सच ये है कि इन्होंने शिक्षा के नाम पर 2000 करोड़ रुपये का घोटाला किया है। तिवारी के मुताबिक 300 स्क्वायर फीट का एक कमरा बनाने में अधिकतम 3 से 5 लाख का खर्च आता है। लेकिन केजरीवाल सरकार ने एक-एक कमरे के निर्माण के लिए 24 लाख 86 हजार यानी करीब 25 लाख रुपये दिए है।
आरटीआई के खुलासे व मनोज तिवारी के आरोपों के मद्देनजर इसकी जांच कराने के बजाय मनीष सिसोदिया नौटंकी पर उतारू हो गये। एक कमरे की निर्माण लागत 25 लाख कैसे हो गई, इसका जवाब देने के बजाय उन्होंने मनोज तिवारी को उन्हें गिरफ्तार कराने की चुनौती दे दी। हालांकि दिल्ली सरकार के कामकाज पर पैनी नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि सिसोदिया चाहे जो कहें लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि स्कूलों व मुहल्ला क्लिनिकों में भारी भ्रष्टाचार है।
बहरहाल, साल 2014 के आम चुनाव से पहले आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी तमाम लोकतांत्रिक सवालों को उठाते हुए सत्ता में आई थी। धनबल, बाहुबल, जातीय कार्ड और सांप्रदायिकता को धता बताते हुए भ्रष्टाचार से परेशान जनता को नई राजनीति का भरोसा देने वाले अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी में उम्मीद दिखी। इतिहास बना और राजनीति के मायने बदल गए। लेकिन 2019 आते-आते यमुना में बहुत सारा पानी बह चुका है। नई राजनीति का मुलम्मा उतर चुका है। वोट प्रतिशत के आधार पर तीसरे नंबर पर खिसक चुकी पार्टी का दिल्ली में भविष्य बहुत अच्छा नजर नहीं आता है। विधानसभा चुनाव में पार्टी सफल नहीं हुई, या सरकार बनाने में सफल नहीं हुई तो आम आदमी पार्टी के लिए एक बार फिर खुद को मुख्यधारा में लाना बहुत मुश्किल होगा।





बुधवार, 3 जुलाई 2019

कांग्रेस की कमान सोनिया के हाथ


बद्रीनाथ वर्मा
अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने की चर्चा इस बात पर मुहर है कि पार्टी में फिलहाल राहुल युग का पटाक्षेप होकर कांग्रेस की कमान दोबारा सोनिया गांधी के हाथ में आने वाली है।

पहले खबर आई थी कि राहुल गांधी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से खासे नाराज हैं। 25 मई को हार की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक में उन्होंने गहलोत के अलावा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम को जमकर खरी खोटी सुनाई थी। यह खरी खोटी उन्हें अपने-अपने बेटों की जीत को ज्यादा तवज्ज़ो देने के लिए सुनाई गई थी। तीनों ही नेताओं पर वंशवाद को प्रश्रय देने का आरोप लगाते हुए तब राहुल गांधी ने कहा था कि अपने पुत्रों की सीटों पर उलझकर इन नेताओं ने अन्य प्रत्याशियों पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिससे कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। बीते करीब एक दशक से वंशवाद का आरोप पार्टी के विरुद्ध एक बड़ा हथियार भी साबित हुई है। निश्चित तौर पर यह कांग्रेस के लिए मंथन का समय है लेकिन यह मंथन गहरा और वास्तविक होना चाहिए। खैर, यह अब पुरानी बात हो गई क्योंकि जिन अशोक गहलोत को राहुल गांधी ने लताड़ लगाई थी, उन्हीं में सोनिया गांधी को सबसे ज्यादा उम्मीद की किरण नजर आ रही है।
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक अशोक गहलोत को कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अभी गहलोत या कांग्रेस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन कांग्रेस ने इस बारे में मन बना लिया है और अशोक गहलोत को इसके लिए तैयार रहने को भी कहा है। हालांकि इस बारे में तस्वीर अभी साफ नहीं है कि अशोक गहलोत अकेले कांग्रेस अध्यक्ष होंगे या साथ में दो-तीन और नेताओं को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाएगा लेकिन एक बात तो बिल्कुल साफ है कि अगले कुछ दिनों में कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलने जा रहा है। जो कम से कम गांधी परिवार से तो नहीं ही होगा। इसका संकेत खुद राहुल गांधी भी दे चुके हैं। जाहिर है सोनिया गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले अशोक गहलोत पार्टी की पहली पसंद है। अशोक गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बनाये जाने का एक मतलब यह भी है कि पार्टी में फिलहाल राहुल युग का अवसान हो गया है और कांग्रेस एक बार फिर सोनिया की शरण में जा पहुंची है। ऐसा इसलिए क्योंकि बरास्ता गहलोत कांग्रेस की असली कमान सोनिया के ही हाथों में रहेगी। बावजूद इसके राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गहलोत को अगर वाकई कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाता है तो यह कांग्रेस की राजनीति के लिए शुभ संकेत है।
25 मई को जिन अशोक गहलोत को राहुल गांधी ने लताड़ लगाई थी, उन्हीं में सोनिया गांधी को सबसे ज्यादा उम्मीद की किरण नजर आ रही है।
देश के मूर्धन्य पत्रकार राम बहादुर राय की दृष्टि में नये कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत का चयन बिल्कुल सही फैसला है। उनकी छवि कुशल संगठनकर्ता, विनम्र व मिलनसार व्यक्ति के रूप में है। कांग्रेस को इस संकट से ऐसा ही व्यक्ति उबार सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उपलब्ध विकल्पों में से अशोक गहलोत का चयन सही दिशा में उठाया गया कदम है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को निचले स्तर पर मजबूती प्रदान करने की है। जमीन से जुड़े नेता व पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले गहलोत से इसकी उम्मीद की जा सकती है।
राहुल गांधी के नेतृत्व में लगातार मिलने वाली हार ने पार्टी के आत्मविश्वास को डिगा दिया है। राहुल अपनी हरकतों से अक्सर ही अपनी अपरिपक्वता का प्रदर्शन करते रहे हैं। तमाम प्रयासों के बाद भी उनकी छवि इससे बाहर नहीं निकल पाई। देश का मूड न भांप पानी उनकी अक्षमता का द्योतक है। गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने का एक संकेत यह भी है कि अब कांग्रेस राहुल के हाथों से निकलकर सोनिया के हाथ में जा रही है।
गहलोत को सोनिया गांधी का विश्वस्त सिपहसालार माना जाता है। बीते करीब चार दशक से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय गांधी परिवार के प्रति इनकी निष्ठा किसी से छिपी नहीं है। उल्लेखनीय है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस जहां लगातार एक के बाद एक चुनाव हारते जाने का रिकार्ड बना चुकी है। वहीं, सोनिया के नेतृत्व में यही कांग्रेस लगातार दस वर्षों तक केंद्र की सत्ता पर काबिज रही। अब अशोक गहलोत से कांग्रेस जादू की उम्मीद लगाये हुए है। यहां जादू का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि अशोक गहलोत के पिता जादूगर थे। खुद गहलोत भी जादू के कई शो कर चुके हैं।
बहरहाल, अशोक गहलोत वर्तमान कांग्रेस नेताओं में अकेले ऐसे नेता हैं जो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी यानी पूरे गांधी परिवार की लगातार पसंद बने रहे हैं। स्वाभाविक रूप से बहुतों की आंख में वे खटकते भी रहे, पर गहलोत का जादू इस परिवार पर हमेशा बरकरार रहा। गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बनाये जाने के पीछे दो मूल वजह है। पहला, वे पिछड़ी जाति से आते हैं और दूसरा संगठन में काम करने का बृहद अनुभव। वैसे भी राजनीति में संकेतों का बेहद अहम स्थान होता है। केंद्र में सत्तासीन पार्टी भाजपा से ही उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्विता है। इस समय भाजपा में पिछड़े वर्ग का ही आधिपत्य है। प्रधानमंत्री मोदी खुद पिछड़े वर्ग से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस को समझ आ गया है कि अब सवर्ण राजनीति के दिन लद गये। वैसे भी अशोक गहलोत भले ही पार्टी अध्यक्ष रहेंगे लेकिन पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथों में रहेगी। ऐसे में यह कहना समीचीन होगा कि राहुल की नेतृत्व क्षमता परखने के बाद कांग्रेस एक बार फिर सोनिया की शरण में पहुंच गई है।

मंगलवार, 2 जुलाई 2019


गुमनामी के भंवर में चंद्रबाबू!

बद्रीनाथ वर्मा

केवल अपने अहं की तुष्टि के लिए विपक्षी एकता की खातिर दिल्ली से लेकर कोलकाता तक उछलकूद मचाने वाले टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू को उनके ही सूबे की जनता ने ऐसी चपत लगाई कि वे कहीं के न रहे। माया मिली न राम मुहावरे की रचना शायद इन जैसे लोगों को ही ध्यान में रखकर हुई होगी। सांसदों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया, बड़े जतन से बनाई गई प्रजा वेदिका ध्वस्त कर दी गई। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या वह फिर से खड़े हो पाएंगे?

कहां तो तमन्ना थी राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने की, और अब अस्तित्व पर ही बन आई है। बात हो रही है तेलगुदेशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू की। अभी हाल-हाल तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर विपक्ष को एकजुट कर पीएम मोदी की सत्ता की राह रोकने के प्रयास में सरकारी हवाई जहाज से कोलकाता से लेकर दिल्ली तक चक्कर काटते थे। लेकिन इस चक्कर ने उन्हें ऐसा घनचक्कर बनाया कि वे अब न तो घर के रहे, न घाट के। अपनी इस हालत के लिए नायडू स्वयं ही जिम्मेदार हैं। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस कदर जोर मारा कि उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य के दर्जे को लेकर एनडीए से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी राजनीति का एकमात्र एजेंडा मोदी विरोध सेट कर लिया। इसी एजेंडे पर वे अन्य विपक्षी दलों को भी एकजुट करने में लग गये। ममता बनर्जी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक और राहुल गांधी से लेकर फारुक अब्दुल्ला तक को एक मंच पर लाकर पीएम मोदी को जबरदस्त चुनौती देने की उनकी मंशा पूरी तरह से विफल हो गई।
  • नेताओं के मिलने से नहीं बल्कि जनता के दबाव व नेता के प्रति आकर्षण व विश्वास से गठबंधन बनता है। अगर वे अपने ससुर एनटी रामाराव को नजीर मानकर ऐसा कर रहे थे तो उन्हें यह पता होना चाहिए था कि उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी। बोफोर्स के खुलासे के बाद वह हीरो की तरह उभरे थे। गठबंधन जनदबाव का नतीजा था। क्या नायडू इसे समझने में नाकाम रहे?

दरअसल, विपक्ष एक मंच पर नहीं आ पाया तो इसके कारण कई थे। जैसे विपक्ष में कई दल ऐसे थे जो राज्यों में एक दूसरे के विरोधी थे। दिलचस्प बात यह है कि नायडू दिल्ली में भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे थे। और इधर  जगनमोहन रेड्डी ने उनकी सियासी जमीन पर कब्जा कर ली। सवाल है कि आखिर नायडू इतनी उछलकूद क्यों कर रहे थे? चुनाव से पहले तक खुद को भविष्य का किंग मेकरमानकर चल रहे चंद्रबाबू जिस तरह से दिल्ली-कोलकाता एक किये हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा के त्रिशंकु होने की स्थिति में देवेगौड़ा की तरह लॉटरी उनके हाथ भी लग सकती है। यानी वह भी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की लाइन में थे इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन चुनाव परिणामों ने उनके ख्वाबों पर तुषारापात कर दिया। तो क्या यह मान लिया जाय कि उन्हें इस बात का तनिक भी गुमान नहीं था कि उनकी इस उछलकूद में उनके खुद की सियासी जमीन उनके पैरों के नीचे से खिसक रही है? हमेशा से कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाली तेलगूदेशम पार्टी का आंध्र प्रदेश चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करना सूबे की जनता को रास नहीं आ रहा था। यह एक अकल्पनीय गठजोड़ था। अस्तित्व के संकट ने चंद्रबाबू नायडू को यह कहने को मजबूर किया कि कांग्रेस और टीडीपी वैचारिक रूप से एक ही पाले में हैं। नायडू के लिए इस प्रयोग का नतीजा बेहद निराशाजनक रहा। क्या नायडू इस तथ्य से अनभिज्ञ थे कि यह महामिलावट जनता बर्दास्त नहीं कर पायेगी? इतने अनुभवी राजनीतिक दिग्गज से इस तरह की अपरिपक्वता की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर वे ऐसा क्यों कर रहे थे? कहीं वह अपने ससुर एन टी रामाराव का नया संस्करण तो नहीं बनना चाह रहे थे?
  • चुनाव से पहले तक खुद को भविष्य का किंग मेकर’ मानकर चल रहे चंद्रबाबू जिस तरह से दिल्ली-कोलकाता एक किये हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा के त्रिशंकु होने की स्थिति में देवेगौड़ा की तरह लॉटरी उनके हाथ भी लग सकती है। यानी वह भी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की लाइन में थे इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन चुनाव परिणामों ने उनके ख्वाबों पर तुषारापात कर दिया।

गौरतलब है कि 1989 में जनता दल, असम गण परिषद, तेलुगुदेसम पार्टी और द्रमुक ने मिलकर वीपी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया। एनटी रामाराव इस मोर्चे के संयोजक बने। इस मोर्चे ने भाजपा और दो वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए गठबंधन किया। राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स दलालीकांड को लेकर उभरे जनरोष में यह गठबंधन कामयाब रहा था। लेकिन नायडू अगर मोदी सरकार के खिलाफ भी उसी तरह के जनरोष की कल्पना कर रहे थे तो यह निहायत ही बचकाना था। चुनाव परिणामों से भी यह साबित हो गया। अगर ऐसा नहीं था तो फिर उनके इस उछलकूद का मतलब क्या था। भाजपा व मोदी विरोध के नाम पर वह इस जमीनी हकीकत को कैसे भूल गये कि मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई जनहित की योजनाओं का सीधा लाभ जरूरतमंदों को मिलना ऐसा क्रांतिकारी कदम था जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं थी। केवल मोदी विरोध के नाम पर विपक्षी एकजुटता जनता को नागवार गुजर रहा था। नेताओं के मिलने से नहीं बल्कि जनता के दबाव व नेता के प्रति आकर्षण व विश्वास से गठबंधन बनता है। अगर वे अपने ससुर एनटीआर को नजीर मानकर ऐसा कर रहे थे तो उन्हें यह पता होना चाहिए कि उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी। बोफोर्स के खुलासे के बाद वह हीरो की तरह उभरे थे। क्या नायडू जैसे नेता भी इसे समझने में नाकाम रहे? अगर हां, तो क्यों और अगर नहीं तो फिर क्या वजह रही? यूं तो चंद्रबाबू नायडू की इस कवायद के पीछे कई वजहें थी, मगर उनमें से सबसे बड़ी वजह अपने वजूद की थी। अपने सूबे आंध्र प्रदेश में अपनी सरकार को बनाए रखने के लिए वह वाईएसआर कांग्रेस के साथ एक जबर्दस्त सियासी संग्राम लड़ रहे थे।
बहरहाल, 2014 के चुनाव में चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इसका न केवल उन्हें बल्कि भाजपा को भी फायदा मिला था। राज्य की 25 लोकसभा की सीटों में से चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलगुदेशम को 15 और 175 सदस्यीय राज्य विधानसभा में 126 पर विजय मिली थी। इसी तरह भाजपा को लोकसभा की दो और विधानसभा की चार सीटों पर जीत मिली थी। इसी के साथ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 30 साल बाद केंद्र में पहली बार कोई गैरकांग्रेसी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। पीएम मोदी ने अपनी सरकार में सभी घटक दलों को शामिल किया। नायडू की पार्टी भी मंत्रिपरिषद का हिस्सा बनी। लेकिन आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिये जाने को मुद्दा बनाकर नायडू की पार्टी एनडीए सरकार से अलग हो गई और मोदी विरोध का झंडा उठा लिया।
मोदी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने हर वह जतन किया, जो वह कर सकते थे। लेकिन देश की जनता की तो बात ही क्या कहें खुद आंध्र प्रदेश की जनता को भी उनका यह बेसुरा राग नहीं सुहाया। नतीजा चुनावों में उनकी पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। लोकसभा की महज तीन और विधानसभा की केवल 23 सीटों पर सिमट गई नायडू की पार्टी का हाल देखकर तो यही अंदाजा लगता है कि विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास वह खुद के अस्तित्व की रक्षा के लिए कर रहे थे। विशेष राज्य के दर्जा का शिगूफा छोड़ देश भर में सक्रिय रहकर वह सूबे की जनता की सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें लगा कि खुद को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत कर जनता की भावनाओं का दोहन कर वे आंध्र की गद्दी पर काबिज होने में कामयाब हो जायेंगे। लेकिन उनकी यह चाल बुरी तरह से फेल हो गई।

बहरहाल, राज्य की सत्ता गंवाने और लोकसभा चुनाव में भारी हार के बाद अब पार्टी भी टूट गई है। उधर, नायडू विदेश में परिवार के साथ छुट्टियां मना रहे थे इधर, उनकी पार्टी के चार राज्यसभा सदस्यों ने उन्हें टाटा बाय-बाय करते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया। दिलचस्प बात यह है कि जिन चार सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, वे सभी नायडू के भरोसे के थे। सांसदों का साथ छोड़ना नायडू की मुश्किलों की शुरुआत भर है। आगे उनकी मुश्किलों में और अधिक इजाफा होने वाला है। मुश्किलों में इजाफे का एक उदाहरण यह भी है कि उनकी लाख मिन्नतों के बावजूद नियम कायदों को दरकिनार कर 8 करोड़ की लागत से बनवाई गई उनके अमरावती स्थित घर से सटी इमारत प्रजा वेदिका को जगन मोहन रेड्डी सरकार ने जमींदोज कर दिया है। मुख्यमंत्री के रूप में नायडू इसी इमारत में जनता दरबार लगाते थे व अफसरों तथा कार्यकर्ताओं से मिलते थे। उन्होंने राज्य सरकार से विपक्ष के नेता के तौर पर इस इमारत की मांग की थी लेकिन गैरकानूनी रूप से बनाये गये इस इमारत को रेड्डी ने ढहा दिया। सियासी पंडितों का मानना है कि उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होने वाली। राज्य की रेड्डी सरकार लगातार उनके फैसलों की समीक्षा कर रही है और कई अहम निर्णयों को रद्द किया गया है। खबरें यहां तक हैं कि कुछ फैसलों को लेकर आने वाले दिनों में नायडू को कटघरे में भी खड़ा किया जा सकता है।

बहरहाल, नायडू ने जोखिम भरा दांव चला था, नतीजों ने इसकी तस्दीक कर दी है। चुनाव से पहले वह कांग्रेस के साथ हो गए। जबकि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को राज्य के विभाजन के लिए जिम्मेदार माना जाता है। गलत वक्त पर लिए गए फैसलों के कारण नायडू प्रदेश में ही नहीं पार्टी के भीतर भी अलोकप्रिय हो गए। नायडू हालांकि ऐसी परिस्थितियों से पहले भी दो-चार हो चुके हैं। 2004 और 2009 में भी उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। चार दशकों से भी लंबे अपने राजनीतिक जीवन में एन चंद्रबाबू नायडू ने कई जोखिम उठाए और अनेक चुनौतियों का सामना किया, मगर मौजूदा चुनौती उन सबसे अलहदा है। यह उनके पूरे राजनीतिक करियर को बना भी सकता है और मिटा भी सकता है। प्रश्न यह है कि क्या वह फिर से खड़े हो पाएंगे?

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

कुर्सी तेरे भाग में दो कौड़ी के लोग


बद्रीनाथ वर्मा
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो हर देशवासी की आंखों में एक सुनहरे भविष्य का सपना था। पर वह सपना धीरे धीरे दिवास्वप्न में तब्दील होता गया। दिन बीतते गये लोकतंत्र राजतंत्र में तब्दील होता गया। वंशवाद से होते हुए सत्ता पर धन बल और बाद में बाहुबल हावी होता गया। अब तो 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस का पालन महज एक रस्म अदायगी भर रह गया है। बस एक वार्षिक समारोह। जिस दिन लालकिले की प्राचीर से हमारे प्रधानमंत्री देश को सपने परोसते हैं। देश को आजादी मिले 69 साल हो गये। यह वक्त कम नहीं होता। एक पूरी की पूरी पीढ़ी बुढ़ा गई। सवाल है कि हमारे स्वतंत्रता  आंदोलन के शहीदों ने जिस उद्देश्य के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे दी क्या हम उसे पूरा कर सके। हमने कुछ क्षेत्रों में प्रगति जरूर की लेकिन आज भी बेरोजगारी, महंगाई व भुखमरी जैसी समस्याओं से हमारा पीछा नहीं छूट सका है। समस्याएं आज भी जस की तस बरकरार हैं और इसकी वजह भ्रष्टाचार है। पड़ोसी मुल्क चीन में मात्र कुछ लाख रुपये रिश्वत लेने के जुर्म में वहां के रेलमंत्री को फांसी की सजा सुना दी जाती है जबकि अपने यहां करोड़ों अरबों डकार जाने वाले हमारे राजनेताओं का एक बाल तक बांका नहीं हो पाता। देश का कोई ऐसा महकमा नहीं बचा जहां भ्रष्टाचार ने अपने पांव नहीं पसारा हो। नीचे से ऊपर तक सभी एक दूसरे से होड़ लेते हुए भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगा रहे हैं। ताकि उनकी सात पीढ़ियां सुरक्षित हो जायें। हमें अंग्रेजों से तो आजादी मिल गई पर स्वराज्य हमसे अभी भी कोसों दूर है। अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का आजादी से तात्पर्य सिर्फ सत्ता हस्तानांतरण से था। बिल्कुल नहीं। लेकिन हुआ यही। सवाल यह है कि यह आजादी मिली किसे। आम आदमी को आजादी का कितना फायदा मिला। देश के नये प्रभुवर्ग ने इसे हाइजैक कर लिया। अंग्रेजी जानने वाली देश की मात्र तीन प्रतिशत आबादी के हाथों में देश की सत्तानबे प्रतिशत जनता के भाग्य निर्धारण की बागडोर है। आज भी देश में अंग्रेजों द्वारा बनाये गये अधिकतर कानून लागू हैं। वही मैकाले की शिक्षा पद्धति, वही पुलिसिया आतंक। कुछ भी तो नहीं बदला। हां, अगर कुछ बदला तो यही कि देश में नया प्रभुवर्ग तैयार हुआ। सत्ता कायम रखने के लिए वोटों की सौदागरी हुई। धर्मनिरपेक्षता के आडंबर के तहत वोटबैंक की राजनीति हुई। यहां तक कि देश की कीमत पर भी। बस बदला तो यही कि गोरे अंग्रेजों की जगह हमारे देशी अंग्रेजों ने ले ली। इधर महंगाई है कि सुरसा के मुंह की तरह लगातार बढ़ती ही जा रही है। दिन ब दिन जिंदगी मुश्किल होती जा रही है। लोगों का जीना दूभर हो रहा है। भ्रष्टाचार की ही देन है कि हर रोज अपना रुपया डॉलर से मात खाता जा रहा है। जिस गति से भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी हुई है उसी तेजी से रुपये का अवमूल्यन भी हुआ है। आज एक डॉलर की कीमत लगभग सरसठ रुपये तक पहुंच चुकी है। जबकि 15 अगस्त 1947 को जब अंग्रेजों से देश को आजादी मिली उस समय रुपया व डॉलर कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। यानी एक रुपया एक डॉलर के बराबर था। लेकिन आजादी के 69 सालों में रुपया भी लगभग रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच गया है। या यूं कहें कि उससे भी आगे। आज एक डालर की तुलना में रुपये की औकात घटकर सरसठ रुपये के आसपास पहुंच गयी है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। हालांकि इसके लिए सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल को दोष देना नाइंसाफी होगी। जब जिस पार्टी को मौका मिला उसने देश को कंगाल बनाने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी। हां, ये दीगर बात है कि आजादी के बाद सबसे ज्यादा सत्ता पर कांग्रेस ही काबिज रही। इस लिहाज से इसका सेहरा इसके सिर ही बंधता है।
शायर अशोक अंजुम के शब्दों में अगर कहें तो दृश्य कुछ इस तरह का दिखता है-
न जाने किस जन्म का, भोग रही है भोग,
कुर्सी तेरे भाग में, दो कौड़ी के लोग।। 

शनिवार, 28 मई 2016

जिंदगी में मिठास घोलते सागर के दो बूंद

बद्रीनाथ वर्मा

133 ए, गली नंबर 21 बिपिन गार्डेन एक्सटेंशन निकट द्वारका मोड़ दिल्ली। यह एक महज पता नहीं है। बल्कि यह ऐसा पता है जहां आकर हर ओर से हारे थके लोगों को जीने की एक नई उम्मीद मिलती है। यहां रहते हैं सागर। इनकी दो बूंद की सलाह अब तक सैकड़ों जिंदगियों को रौशन कर चुकी है। जूनून की हद तक जनसेवा को अपना ध्येय मानने वाले सागर यूं तो शिक्षा मंत्रालय में कार्यरत हैं मगर उनकी इससे एक अलग पहचान भी है। वह पहचान है लाइलाज बीमारियों से लोगों को निजात दिलाने की। होम्योपैथिक औषधियों से असाध्य बीमारियों से पीड़ित लोगों को नवजीवन प्रदान करने वाले सागर का बचपन बिहार के मधेपुरा जिले के सिंहेश्वर में बीता है। स्कूली शिक्षा भी उन्होंने यहीं से पाई है। ज्ञात हो कि सिंहेश्वर सबसे बड़े महादेव मंदिर के लिए देश भर में ख्यात है। पिता से विरासत में मिले होम्योपैथी ज्ञान को उन्होंने स्वाध्याय व व्यापक रिसर्च के सहारे कई सारे ऐसे केसों में जहां बड़े बड़े अस्पतालों व डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे ऐसे लोगों को भी उन्होंने नवजीवन प्रदान किया है। सागर के पास होम्योपैथी या किसी भी मेडिकल पद्धति की कोई डिग्री नहीं है लेकिन स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान के बलबूते निस्पृह भाव से मानव समाज की भलाई के लिए कार्य किये जा रहे हैं। सरकारी नौकरी में होने की वजह से वैसे तो दवा देने से कतराते हैं लेकिन रोग से पीड़ित लोगों की व्यथा से विचलित होकर अंतत: उनका इलाज करने को राजी हो जाते हैं। हालांकि सागर काफी व्यस्त रहते हैं बावजूद इसके चूंकि शनिवार व रविवार को दफ्तर में छुट्टी रहती है सो उस दिन उनके आवास पर दूर दूर से लोग उनके हाथों से दवाइयों की दो बूंद लेने आते हैं। सागर के इलाज से लाभान्वित हुए लोग एक सुर में बताते हैं कि उनके हाथों में जादू है। रोगों को डायग्नोस कर दवाओं का कंपोजिशन वे खुद तैयार करते हैं। जब कोई हर ओर से हारा थका एक उम्मीद लेकर उनके यहां आता है तो वे अपनी पूरी ऊर्जा उसे रोगमुक्त करने में लगा देते हैं। उनकी इसी जूनून का नतीजा है कि जिन रोगों को बड़े बड़े डाक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था वह इन्होंने अपनी दो बूंदों की बदौलत ठीक कर दिया। उनकी सलाह पर होम्योपैथी की दो बूंद लेकर आज सैकड़ों लोग असाध्य समझी जाने वाली बीमारियों से मुक्त होकर खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। सागर के विभाग के सेक्शन आॅफिसर संतोष का चार वर्षीय बेटा सुगर से पीड़ित था। इंसुलिन उसके जीवन के रोजमर्रा का हिस्सा हो गया था। संतोष के मुताबिक जबसे सागर ने उसका इलाज शुरू किया है तबसे उनके बेटे के सुगर लेबल में सुधार की प्रक्रिया शुरू है। उन्हें विश्वास हो गया है कि जल्द ही उनका बेटा पूरी तरह से ठीक हो जाएगा और उसे इंसुलिन की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसी तरह उनकी सहकर्मी रश्मि बताती हैं कि उनकी बेटी दो-दो तीन-तीन दिन तक लैट्रिन नहीं जा पाती थी लेकिन सागर की दवा से उसे इस परेशानी से मुक्ति मिल गई है। सागर की  दो बूंद की सलाह से नवजीवन पाए ऐसे सैकड़ों लोगों की अपनी अपनी कहानियां हैं। निरोग हो चुके ऐसे लोग उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते। 

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

समाजवाद के चोले में परिवारवाद का पोषण


(मेरा यह आलेख देश के कई नामी गिरामी अखबारों में प्रकाशित हुआ है। )
कांग्रेस के वंशवाद को लेकर कोसने वाली लगभग सभी पार्टियां आज पूरी तरह से वंशवाद, परिवारवाद और भाई भतीजावाद के शिकंजे में कसी हुई हैं। क्षेत्रीय पार्टियों का तो हाल और भी बुरा है। समाजवाद व सामाजिक न्याय जैसे भारी भरकम शब्दों का सहारा लेकर तमाम क्षेत्रीय राजनीतिक दल प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तर्ज पर चल रहे हैं। समाज के वंचित वर्गो व दबे कुचलों के हक के लिए गला फाड़कर चिल्लाने वाले इन तथाकथित सामाजिक न्याय के पुरोधाओं के सामने जब अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने का सवाल आता है तो अपने परिवार से आगे इन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता। अपने परिवार व बेटों बेटियों को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपकर उन्हें सियासत में स्थापित करने के लिए ये किसी भी हद तक चले जाते हैं। समाजवादी पार्टी से लेकर राष्ट्रीय जनता दल तक या फिर लोकजनशक्ति पार्टी तक सभी दलों का एकमात्र एजेंडा परिवारवाद का पोषण करने से इतर कुछ भी नहीं है। लोहिया को अपना आदर्श मानने वाली समाजवादी पार्टी जहां मुलायम सिंह की जागीर बन गई है तो जयप्रकाश नारायण का चेला कहलाने में गर्व महसूस करने वाले लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल लालू पति-पत्नी, बेटी एंड संस। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के बेटे, बहु तथा भाइयों भतीजों को लेकर कुल 14 लोग समाजवाद को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।  तेरह लोग पहले से थे, चौदहवें का प्रादुर्भाव पंचायत चुनावों के जरिए हो रहा है। उधर, राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव अदालत द्वारा चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराए जाने के बाद अपने दोनों बेटों तेज प्रताप व तेजस्वी यादव को बिहार की राजनीति में स्थापित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहे। एक बेटे को राघोपुर से तो दूसरे को महुआ से चुनावी मैदान में उतार कर साफ संकेत दे दिया है कि राजद उनकी पारिवारिक पार्टी है। राजद लालू की पारिवारिक पार्टी है वे इससे पहले भी साबित कर चुके हैं। याद होगा चारा घोटाले में जेल जाने से पूर्व उन्होंने तमाम वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर अपनी अंगूठाछाप पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित कर दिया था। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब लालू प्रसाद ने अपनी बेटी मीसा भारती को राजनीति में स्थापित करने के चक्कर में अपने सबसे विश्वस्त साथी रामकृपाल यादव को खो दिया। रामकृपाल यादव की ख्याति लालू के हनुमान के रूप में रही है। लोकसभा चुनाव में टिकट काटे जाने से नाराज रामकृपाल यादव ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया और मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़कर बिहार में यादवों का एकमात्र नेता होने का लालू प्रसाद का भ्रम तोड़ दिया। यादव बहुल सीट पटना साहिब से उन्होंने लालू को उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसी पटखनी दी कि वे बगले झांकने पर मजबूर हो गये। हालांकि इससे लालू ने कोई सबक नहीं लिया। लालू की राजनीतिक विरासत पर दावेदारी करने के अपराध में राजद मुखिया ने मधेपुरा से सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को पार्टी से चलता कर दिया। लालू के पारिवारिक न्याय में बाधा बने रामकृपाल व पप्पू का आरोप है कि लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय की आड़ में पारिवारिक न्याय करने में व्यस्त हैं। बहरहाल, लालू को खुश करने के लिए नीतीश कुमार को राघोपुर से जदयू के सीटिंग एमएलए सतीश कुमार का टिकट काटना पड़ा। इससे आहत सतीश कुमार बीजेपी में शामिल हो गये और अब केसरिया झंडे के तले लालू को चुनौती दे रहे हैं। बहरहाल, दलितों के खैरख्वाह रामविलास पासवान जिन्हें लालू प्रसाद मौसम वैज्ञानिक करार दे चुके हैं के कुनबे का हर सदस्य लोक जनशक्ति पार्टी के किसी न किसी पद पर काबिज है। रही बात चुनाव लड़ने की तो उनके दोनों भाई पशुपति कुमार पारस व रामचंद्र पासवान तो चुनाव लड़ ही रहे हैं उनके भतीजे व रामचंद्र पासवान के बेटे भी लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। अलबत्ता इस बीच पासवान की पहली बीवी से पैदा बेटी उषा पासवान के पति अनिल कुमार साधु ने टिकट नहीं मिलने पर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। साधु ने अपने ससुर की पोल खोलने की धमकी देते हुए पप्पू यादव की पार्टी जन अधिकार पार्टी का रुख कर लिया है। अब बात जीतनराम मांझी की। उनके बेटे संतोष मांझी भी हम के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर चुके हैं इससे नाराज मांझी के दामाद देवेंद्र मांझी ने भी पप्पू की पार्टी ज्वाइन कर ली है। उनका आरोप है कि जीतनराम उनकी कीमत पर अपने पुत्र को आगे बढ़ा रहे हैं।
उधर, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कुनबे का 14वां सदस्य पंचायत चुनाव के जरिए सक्रिय राजनीति में शामिल हो गये हैं। सपा मुखिया के छोटे भाई राजपाल यादव के बेटे अभिषेक उर्फ अंशुल इटावा के जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र के तकहा विकास खण्ड से जिला पंचायत सदस्य पद के उम्मीदवार हैं। राजपाल यादव की पत्नी प्रेमलता जिला पंचायत की अध्यक्ष हैं। इटावा के एक वरिष्ठ सपा नेता का दावा है कि अंशुल यदि चुनाव जीतते हैं तो वह जिला पंचायत अध्यक्ष के दावेदार हो सकते हैं। सपा के कद्दावर नेता और मुलायम सिंह यादव के भाई राम गोपाल यादव भी इटावा के जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं।
सपाध्यक्ष के कुनबे से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनकी सांसद पत्नी डिम्पल यादव उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग मंत्री शिवपाल सिंह यादव, उनकी पत्नी सरला और पुत्र आदित्य, राज्यसभा सदस्य राम गोपाल यादव और उनके पुत्र लोकसभा सदस्य अक्षय यादव, दिवंगत रणवीर यादव और उनके सांसद पुत्र तेज प्रताप, सांसद धर्मेन्द्र यादव और उनके छोटे भाई अनुराग, प्रेमलता और अब उनके पुत्र अभिषेक राजनीति में हैं। 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

ए सखि साजन? ना सखि नेता


( मासिक पत्रिका कैमूर टाइम्स में प्रकाशित
जब जब अपनी लय मे आवे 
चांद सितारों से ललचावे
मुझको सबसे प्रिय बतलाता
का सखि साजन? ना सखि नेता। ‘कह मुकरी’ की ये पंक्तियां बिहार विधानसभा चुनाव का मिजाज पढ़े जाने के लिहाज से बिल्कुल उपयुक्त हैं। लोक काव्य की सबसे अधिक चर्चित विधाओं में से एक है ‘कह मुकरी’। इसका सीधा सा अर्थ है कुछ कहकर उससे मुकर जाना। ‘कह मुकरी’ मूलत: दो सखियों के बीच एक ऐसा संवाद है, जिसमें पहले तीन पदों में एक सखी अपने प्रिय को याद करती जान पड़ती है। जब चौथे पद में उसकी सखी उसके कथनों से 'साजन' अभिप्राय लगाती है, तब पहली सखी अपनी बात से मुकर जाती है और पहले तीन पदों में कही अपनी बातों का कुछ और ही अर्थ बता देती है। बिहार विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखें तो मतदाताओं की झोली में चांद सितारे तक डाल देने की बातें हो रही हैं। इसके लिए एक से बढ़कर एक नारे गढ़े गये हैं। चुनावी घोषणाओं की झमाझम बारिश हो रही है। जनता को लुभाने के लिए हर बार की तरह इस बार भी घोषणापत्र या यह भी कह सकते हैं कि वादों का पुलिंदा जारी करने की परंपरा का बखूबी निर्वहन किया गया है। इन घोषणापत्रों या वचन पत्रों अथवा विजन पत्रों में वादों की लंबी फेहरिश्त है। घोषणापत्र जारी करने की परंपरा राजनीति की उस पीढ़ी ने शुरू किया था जो आजादी के आंदोलन से निकली थी। आजादी के आंदोलन से निकले इन तपे तपाये नेताओं के मन में देश को बदलने की हसरत थी। तब घोषणापत्र में कही गई हर बात को पूरा करना  उनका मकसद होता था। मगर आज घोषणापत्र जारी करना राजनीतिज्ञों के लिए एक रस्म भर बन कर रह गई है। हो भी क्यों न, इसे जनता चुनाव के पहले नहीं पढ़ती और नेता चुनाव के बाद। कुल मिलाकर माजरा ‘कह मुकरी’ से तनिक भी अधिक नहीं है। यहां पैकेज को भुनाने से लेकर भावनाएं उभारकर वोटों की फसल काटने की तरकीबें आजमाई जा रही हैं। सच यह भी है कि अक्सर भावनाएं मुद्दों पर भारी पड़ जाती हैं। इन सबके बावजूद जातिवाद, परिवारवाद और वंशवाद बिहार की राजनीति का वास्तविक यथार्थ है। बिहार में जातियता किस कदर गहरा जड़ जमाए बैठी है इसकी बानगी इसी से जानी जा सकती है कि कुशवाहा मतों को अपनी ओर खींचने के लिए नीतीश कुमार ने अपने तत्कालीन सहयोगी उपेंद्र सिंह को बाकायदा एफिडेविट के जरिए उपेंद्र कुशवाहा बना दिया। बिहार दौरे के दौरान कैमूर टाइम्स की टीम ने साफ महसूस किया कि पढ़े लिखे लोग भी जातियता के फंदे से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। चाहे वह मुगलसराय में पदस्थ दानापुर निवासी रेलवे में ड्राइवर राजेंद्र सिंह हों या मेरठ छावनी में तैनात आरा निवासी फौजी अरुण यादव। स्वजातीय होने की लिहाज से लालू यादव के प्रति इनका झुकाव स्पष्ट दिखा। वहीं युवाओं व अन्य लोगों को मोदी का विकास लुभा रहा है। इससे इतर राजनीतिक रूप से जागरूक बिहार के हर गली कूचे में चुनावी गणित सुलझाने के साथ ही राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की जीत-हार पर चर्चा चरम पर है। सभी के अपने-अपने तर्क होते है। चुनावी बहस का मुख्य मुद्दा है कि अगली सरकार किसकी बनेगी, कौन बड़ा नेता चुनाव हार जायेगा या फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोबारा सत्ता में वापसी करेंगे या नहीं। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी के सवा लाख करोड़ रुपये के विशेष पैकेज का एनडीए को कितना लाभ मिलेगा। बहस के दौरान ही कोई राजग की जीत तय मान रहा होता है तो कोई महागठबंधन की ही दोबारा सरकार बनाने की बात करता है। सभी को लगता है कि उसके दावे में दम है। 
खैर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए लगातार नीतीश कुमार पर लगातार आक्रामक वार करता जा रहा है। नीतीश अपनी कमजोरी को ताकत बनाने की कोशिश में हैं। एनडीए जितना अटैक कर रहा है नीतीश अपने आप को उतना ही कमजोर व असहाय पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। तमाम मुद्दों को किनारे कर नीतीश ने बड़ी चालाकी से डीएनए शब्द को मुद्दा बनाने की कोशिश की। नीतीश शायद इस अहसास तले काम कर रहे हैं कि पीएम मोदी की छवि को तोड़ने के लिए बिहार में विकास को नहीं, भावना को मुद्दा बनाना होगा। डीएनए का मुद्दा फ्लाप होने के बाद पीएम द्वारा उन्हें याचक कहे जाने को मुद्दा  बनाने लगे। दरअसल नीतीश कुमार की पूरी कोशिश इस छवि को पेश करने की है कि वे असहाय हैं और बीजेपी केंद्र से ताकत लेकर उन पर हमले कर रही है। दरअसल, यह सब करने के पीछे नीतीश कुमार की सोची समझी गहरी रणनीति है। इसी तरह की रणनीति को अभी हाल ही में दिल्ली में जबरदस्त सफलता मिली है। एड़ा बनकर पेड़ा खाने वाली इसी राजनीति को अपनाकर अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गये। केजरीवाल ने पूरी शिद्दत के साथ अपनी छवि ताकतवर विरोधियों के सामने एक लाचार संघर्षशील नेता वाली पेश की। राजनीति में असली मालिक जनता होती है। ताकत भी जनता के पास ही होती है। मालिक के पास अगर कोई शौक से भी असहाय शोक मनाए तो मालिक सहानुभूति का मत प्रदान कर देता है। शायद इसीलिए नीतीश कुमार शौक से शोक मना रहे हैं।

नाक की लड़ाई बन चुके बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे बताएंगे कि कौन हाफ हुआ और कौन साफ हो गया। हाफ और साफ इसलिए क्योंकि अगर भाजपा हारी तो मोदी हाफ और महागठबंधन की पराजय हुई तो नीतीश कुमार पूरी तरह से साफ। दरअसल, इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा पूरी तरह से दांव पर लगी हुई है। अगर भाजपा या एनडीए की हार हुई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की सेहत पर भले ही तात्कालिक रूप से कोई खास असर नहीं पड़ेगा पर हां, एक बात जरूर है कि उनका आभामंडल जरूर छीजेगा। साथ ही बिहार कोटे से केंद्र में मंत्री बनाए गये कई नेताओं की कुर्सी भी खतरे में पड़ जाएगी। दिल्ली चुनाव को अगर अपवाद मान लें तो लोकसभा चुनाव के बाद अब तक हरियाणा, महाराष्ट्र से लेकर जम्मू-कश्मीर व झारखंड विधानसभा के चुनाव में ब्रांड मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला है। इसी प्रकार यदि महागठबंधन की पराजय होती  है तो नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी पूरी के पूरी तरह से खत्म हो जाने की संभावना अधिक है। यही कारण है कि दोनों ओर से कोई भी कोर कसर बाकी नहीं रखी जा रही है।
बहरहाल, बिहार विधानसभा चुनाव का अखाड़ा पूरी तरह से सज गया है। ताल ठोंक रहे पहलवान बाजी मारने के लिए हर दांव-पेंच आजमा रहे हैं। कुछ पहलवान पिछले चुनाव की तरह अपनी पार्टी से चुनाव मैदान में हैं तो कई ऐसे हैं जिन्होने अपने दलों से नाता तोड़कर नई पार्टी के साथ अपनी बिसात बिछा ली है। इस बार कई ऐसे चेहरे हैं जो बिहार के लिए भले ही जाने-पहचाने हो, लेकिन वे पहली बार अपनी पार्टी को अखाड़े में लड़वाने निकले है। इन नये कप्तानों की विधान सभा चुनाव में अग्निपरीक्षा होने वाली है। चुनाव में कई छोटे-बड़े नाम ऊंची उड़ान भरने को आतुर है। अब इन कप्तानों के लिए ‘सपने कितने सुहाने होते हैं’। यह चुनाव परिणाम ही तय करेंगे। जिन नये कप्तानों पर खासकर नजरें टिकी हंै उनमें राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के अध्यक्ष और केन्द्रीय राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा, हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष एवं सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, समरस समाज पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री नागमणि, गरीब जनता दल सेक्यूलर के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद तथा लालू प्रसाद यादव के साले अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव और समाजवादी जनता दल के अध्यक्ष एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री देवेन्द्र यादव की पार्टी शामिल है। इन कप्तानों की व्यथा और कथा एक जैसी ही है। पहली बार कप्तान के रूप में ताल ठोंक रहे इन नेताओं में एक समानता है कि ये सभी जिन दलों के खिलाफ पहलवानों को उतारने की तैयारी में लगे है वहां के वह पहले योद्धा थे। 
उधर, चुनावी समर जीतने के लिए सभी दलों और गठबंधनों का खासा जोर लोकलुभावन नारे देकर जनता को हरसंभव अपनी तरफ आकर्षित करने की है। चुनावी नारों की इस बरसात से कोई भी दल अछूता नहीं है। इन नारों में पार्टियों का दृष्टिकोण तो झलकता ही है साथ ही साथ इनमें विरोधियों के लिए भरपूर व्यंग्य वाणों का भी समावेश किया गया है। वैसे नारों और स्लोगनों के आधार पर जनता को जगाने और लुभाने का चलन कोई नया नहीं है। हाईटेक प्रचार और स्लोगन के जरिए लोकसभा चुनाव में सभी पूवार्नुमानों को झुठलाते हुए प्रचंड बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने वाली भाजपा ने प्रधानमंत्री के सवा लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा के बाद से राज्य के लोगों को यह बताने में लगी है कि ‘बिहार के विकास में अब नहीं बाधा ,मोदीजी ने दिया है वादे से ज्यादा’। इसके अलावा राज्य में जंगलराज की वापसी को लेकर महागठबंधन पर तंज कसता हुआ नारा ‘बीजेपी करेगी पहला काम, जंगलराज पर पूर्णविराम’। वहीं राजग में शामिल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने नारा दिया है नया बिहार बनायेंगे लालू-नीतीश को भगायेंगे। उधर, लालू की पार्टी ने नारा दिया है ‘युवा रूठा नरेन्द्र मोदी झूठा’ एक अन्य नारे में राजद ने लिखा ‘न जुमलो वाली न जुल्मी सरकार गरीबों को चाहिये अपनी सरकार’ तथा ‘गरीबों की आवाज है लालू हम सब की परवाज है लालू’।
इसी तरह सतारूढ़ जदयू का पैकेज पर पलटवार खासा दिलचस्प है। ‘झांसे में न आयेंगे नीतीश को जितायेंगे’, सबको सम्मान और अधिकार फिर एक बार नीतीश कुमार, बहुत हुआ जुमलों का वार फिर एक बार नीतीश कुमार। आदि आदि। वैसे, बिहार की चुनावी पिच पर विभिन्न पार्टियों के दिग्गज बल्लेबाजों द्वारा ताबड़तोड़ जड़े जा रहे चुनावी नारों के ये छक्के जनता की दीर्घा (स्टैंड) तक का सफर तय करने में कितने कामयाब हो पाते हैं, इसका पता आठ नवंम्बर को ही चल सकेगा जब लोगों का मत ईवीएम से बाहर निकलेगा। हां, एक बात तो तय है कि मुकाबला कांटे का है।

बुधवार, 30 सितंबर 2015

इंटरव्यूः नीरज कुमार, प्रवक्ता-जदयू

छह लोगों को तो नौकरी दे नहीं सके, लाखों को कैसे देंगे

चुनावी खुमार में डूबने लगा है बिहार। आपके मुद्दे क्या हैं।
हमारा मुद्दा है, बदलता बिहार, बढ़ता बिहार और कानून का राज, सांप्रदायिक सौहार्द्र और सबके साथ न्याय।
कानून का राज या जंगलराज। विरोधी तो यही कह रहे हैं?
स्वाभाविक है कि भाजपा ने जो वादे किये और जो उनकी उपलब्धियां हैं उस पर सार्थक बहस कर नहीं सकते। इसलिए बार-बार इस जुमले को माननीय मोदीजी अपनी हर सभा में रिपीट कर रहे हैं। चूंकि उपलब्धियों के नाम पर बताने को कुछ है नहीं और नीतीश कुमार पर सीधा हमला कर नहीं सकते, विकास के मुद्दे पर फंस जाएंगे इसलिए नकारात्मक राजनीति की जा रही है। वहां तो सिर्फ एक ही ब्रह्मास्त्र हैं नरेंद्र मोदी, सिपाही भी और सेनापति भी। लेकिन इस बार जबर्दस्त हार मिलने वाली है। 
लेकिन जंगलराज का तमगा भी तो खुद नीतीश कुमार ने ही दिया था?
नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक शब्दावली में कभी भी इस शब्द का प्रयोग नहीं किया। सबसे पहले यह शब्द पटना हाईकोर्ट के एक न्यायायिक आॅब्जर्वेशन में आया था। कानून का राज नेतृत्वकर्ता पर तय होता है। हमारे यहां नेतृत्वकर्ता नीतीश कुमार हैं, जिन्होंने कानून का राज स्थापित कर दिखाया है। उनके यहां नेतृत्व कौन करेगा? लालू प्रसाद बहुत खराब और रामकृपाल यादव बहुत अच्छे। पप्पू यादव प्रेरणा स्रोत बने हैं। उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा दी जा रही है। जिनके नाम से बिहार की जनता दहशत खाती रही है उन तमाम आपराधिक छवि के फ्रीडम फाइटरों की सहायता से कानून का राज स्थापित करेगी भाजपा?
भाजपा के मुताबिक मुख्यमंत्री बनने लायक उसके पास दर्जनों नेता हैं?
दर्जनों नेता हैं तो किसी एक का नाम बता क्यों नहीं देते? भाजपा कह रही है कि सरकार उसी की बनेगी तो नाम घोषित कर देने में परेशानी क्या है। सर्वनाम की बजाय संज्ञा में नाम घोषित कर बिहार की जनता को आश्वस्त कर दें ताकि पता तो चले कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा।
गठबंधन के बिखराव व उठ रहे विरोधी स्वरों से कैसे निपटेंगे?
कहीं कोई बिखराव नहीं है। एनसीपी हमारी सहयोगी पार्टी है। उसे मना लिया जाएगा। हमारा प्राथमिक उद्देश्य भारतीय जनता पार्टी को हराना है और इसके लिए सबको एकजुट रहना होगा और कुर्बानी भी देनी होगी। रही बात रघुवंश बाबू की तो वे हमारे वरिष्ठ नेता हैं। किसी भी परिवार में चलती तो मुखिया की ही है और राजद के मुखिया लालू प्रसाद हैं। इसलिए चिंता करने की बात नहीं है।
पहले आप 115 थे लेकिन अब सौ सीटों पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। यह आपका प्रमोशन है, डिमोशन है या मोदी का भय?
न यह प्रमोशन है न डिमोशन है और न ही मोदी का भय है। नीतीश कुमार के भय से तो पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल पिछले कई महीनों से पटना में डेरा डाले हुए है। जहां तक कम सीटों पर लड़ने का प्रश्न है तो सीटें तो सीमित हैं, उसी में सबको लड़ना है इसलिए त्याग तो करना पड़ेगा। हमने बड़े लक्ष्य के लिए यह त्याग किया है। बड़े उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सीटों की संख्या मायने नहीं रखती। और हमारी तारिक अनवर से भी यही अपील है कि वे सीटों की संख्या को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाकर भाजपा को हराना अपना प्राथमिक लक्ष्य बनायें। 

इन दिनों सभी पार्टिया बिहार को बदलने में लगी हैं। आखिर कौन बदलेगा बिहार?
जनता जानती है कि कौन बदलेगा बिहार। 15 महीनों में बिहार के संदर्भ में किये गये लंबे चौड़े वायदों की ओर नहीं जा रहा। बस भाजपा यही बता दे कि पटना के गांधी मैदान में जो दुखद आतंकी ब्लास्ट हुआ उसमें मारे गये छह लोगों के परिजनों को माननीय मोदीजी ने नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन आज तक उन छह लोगों को भी नौकरी नहीं दे पाये, ऐसे में भला वह कैसे लाखों नौजवानों को रोजगार देंगे। जबकि बिहार में जहां संसाधन सीमित है वहां नीतीश कुमार ने प्रत्येक ग्राम पंचायत में 25-30 युवाओं को औसतन रोजगार दिया है। सीमित संसाधनों के बीच ऐसा करने वाला बिहार पहला राज्य है। मैं भाजपा को चुनौती देता हूं कि इसे गलत साबित कर बताए। भाजपा की तरफ से जो भी वायदे किये गये उनमें से कोई भी वादे सरजमीं पर नहीं उतरें जबकि नीतीश कुमार ने जो कहा उसे पूरा कर दिखाया।

बिहार के लिए विशेष पैकेज की मांग की जा रही थी। अब प्रधानमंत्री ने मांग से भी अधिक देकर आपसे वह मुद्दा भी छीन लिया?
जो मंत्रिपरिषद से स्वीकृत नहीं, कैबिनेट का निर्णय नहीं। संसद द्वारा पारित नहीं वह पैकेज नहीं छलावा है। संविधान के अनुच्छेद 275 में स्पष्ट वर्णित है कि राज्य को कोई अनुदान दिया जाएगा वह विधि के अनुसार होगा। अगर मंशा साफ थी तो क्यों नहीं मानसून सत्र में इसकी घोषणा की गई। मोदीजी को तो पैकेज व अनुदान तक का अंतर नहीं पता। कैसे बोल दिया कि वाजपेयीजी ने बिहार बंटवारे के वक्त पैकेज दिया था। वह पैकेज नहीं अनुदान था। भगवान भरोसे ही चल रहा है देश।
एक सीधे सवाल का सीधा जवाब दीजिए। आप चुनाव लड़ रहे हैं गठबंधन में लेकिन बढ़ता बिहार के पोस्टरों में एक भी घटक दल के नेता की तस्वीर नहीं?
पहली बात तो यह कि ‘बढ़ता बिहार, बदलता बिहार’ किसी राजनीतिक दल ने नहीं राज्य सरकार के सूचना विभाग द्वारा जारी किया गया है। जनता दल यू राजनीतिक दल है जब पार्टी अपना बैनर, पोस्टर जारी करेगी उसमें गठबंधन शामिल सभी दलों के नेताओं की तस्वीर होगी।