सोमवार, 13 अगस्त 2012

छिः बंगाल



गुर्दा मंडी - जिंदगी के लिए मौत का सौदा (राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका इतवार में प्रकाशित)
राज्य में मां, माटी मानुष की सरकार अपनी सफलता के ढिंढोरे पीट रही है। एक से बढ़कर एक दावे किये जा रहे हैं। दोनों हाथों से खैरात बांटे जा रहे हैं। आरोप है कि ऐसा पंचायत चुनावों के मद्देनजर किया जा रहा है। वहीं असल सच्चाई यह है कि राज्य की जनता अपनी जिंदगी की गाड़ी चलाने के लिए अपनी किडनी बेच रही है। बच्चों का पेट पालने के लिए औने पौने दामों में किडनियां बेचने को मजबूर इन मां-बाप का कसूर क्या है। है किसी के पास इसका जवाब। क्या इनका कसूर यह है कि वे गरीब हैं। इससे ज्यादा पीड़ादाई और शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि पेट की आग बुझाने के लिए लोग अपनी किडनी बेच रहे हैं। एक दो लोग नहीं बल्कि पूरा का पूरा गांव ही किडनी बाजार या गुर्दा मंडी के रूप में तब्दील हो चुका है। सबसे बड़ी त्रासदी तो यह है कि गुर्दा मंडी के रूप में कुख्यात हो चुका यह गांव आम आदमी की सरकार का दावा करने वालीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शासित राज्य में स्थित है। रेलवे के किराये में सामान्य वृद्धि मां, माटी मानुष की बात करने वालीं ममता बनर्जी को विचलित कर देता है। जबकि बंगाल का पूरा का पूरा एक गांव गुर्दा मंडी के रूप में कुख्यात हो गया है फिर भी उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। वीर सावरकर विचार मंच के महासचिव व सामाजिक कार्यकर्ता श्यामसुंदर पोद्दार के अनुसार यह राजनीतिक दोगलापन है। है कोई जवाब अग्निकन्या के पास। हर जिम्मेदार नागरिक के मन में ये सवाल घुमड़ रहे हैं। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर उन बेचारे गांववालों का क्या कसूर है। उनकी शुधि लेने वाला कोई क्यों नहीं है। क्या उनके प्रति सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। सबसे आश्चर्य तो यह है कि अधिकतर गांववालों के पास न तो बीपीएल कार्ड है और न ही मनरेगा के तहत उन्हें 100 दिनों का रोजगार ही उपलब्ध है।

उत्तर दीनाजपुर के ग्यारह मौजे की बिंडोल पंचायत की यह नियति ही बन चुकी है। कोई काम धंधा न होने के कारण लोग जिंदगी के लिए मौत का सौदा कर रहे हैं। अपना व बच्चों का पेट पालने की जद्दोजहद में लगे यहां के आम आदमी को जब बच्चों की भूख बर्दाश्त नहीं होती तो वह अपनी किडनी बेचकर बच्चों के लिए भोजन का जुगाड़ करता है। हालत यह है कि यहां हर घर में एक दो लोग अपनी किडनी बेच चुके हैं। मानव अंग के तस्कर मात्र चंद रुपये में गरीबी की मार झेल रहे गांववालों से उनकी किडनी खरीद कर कोलकाता के बाजार में लाखों का वारा न्यारा करते हैं। और अपनी किडनी देने वाले गांववालों को इसके बदले मिलते हैं मात्र कुछ हजार रुपये। गांव के अधिकतर लोग अनपढ़ हैं। हों भी क्यों न। जहां खाने को लाले पड़े हों वहां शिक्षा की बात करना ही बेमानी है। इसी का फायदा उठाते हैं मानव अंगों के तस्कर। उनकी अशिक्षा व गरीबी का फायदा उठाते हुए उन्हें पैसों का लालच दिया जाता है। बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाये जाते हैं। लाखों रुपये देने का वादा किया जाता है। गरीबी से त्रस्त लोग जल्द ही उनके झांसे में आ जाते हैं और हथियार डाल देते हैं। इसके बाद कोलकाता ले जाकर किडनी का ट्रांसप्लांट होता है। इसके बाद हाथ पर धर दिये जाते हैं मात्र कुछेक हजार रुपये। मजबूर गांववाले इसे भी किस्मत का दोष कहकर मन मसोस कर रह जाते हैं। आखिर इसके लिए कौन दोषी है। मानव अंगों के तस्कर या जिंदगी की गाड़ी चलाने के लिए मौत का सौदा करने वाले ये मासूम ग्रामीण अथवा अपने नागरिकों को इज्जत की दो रोटी न दे पाने वाली सरकार। सवाल कटु है पर जवाब नदारद है। इसका जवाब शायद मां, माटी मानुष की पुरोधा ममता बनर्जी के पास भी नहीं है।

ममता बनर्जी से यह सवाल इसलिए कि उनके द्वारा शासित पश्चिम बंगाल के उत्तर दीनाजपुर इलाके के गांव आज किडनी बाजार में बदल चुके हैं। किडनी के दलालों का गिरोह इनसे मनमाने दामों पर किडनी खरीदता है और उन्हें ऊंचे दाम पर कोलकाता के बड़े-बड़े अस्पतालों को बेच देता है। इससे किडनी बेचने वालों के हालात नहीं सुधरे बल्कि वो अब बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। उत्तर दीनाजपुर के 11 मौजे की बिंडोल ग्राम पंचायत का बलिया गांव भयानक गरीबी के पांव तले सिसक रहा है। मछली पकड़कर गुजारा करने वाले ये गांव वालों को गरीबी की जाल ने ऐसा फंसाया कि इनके पास आज मछली पकडऩे के लिए जाल तक नहीं है। दूसरा कोई धंधा है नहीं, लिहाजा जिंदा रहने की जद्दोजहद ने इन्हें अपने जिस्म के अंग बेचने को मजबूर कर दिया। और इसी के साथ मानव अंगों के दलालों के लिए एक नया मार्केट खुल गया।

6 साल पहले गांव के संगलू जाल ने 80 हजार रुपये में किडनी बेची। उसे उम्मीद थी कि इससे उसे व उसके बच्चों को फांकाकशी से मुक्ति मिल जायेगी। आपरेशन के बाद पौष्टिक भोजन की कमी की वजह से उसे बीमारियों ने जकड़ लिया। आज उसका पूरा परिवार भुखमरी का शिकार है। सात लोगों के परिवार का पेट भरने और गरीबी से निपटने के लिए मंगलू ने भी यही रास्ता अपनाया। भूख से लडऩे के लिए उसने अपना पेट कटवाया लेकिन 70 हजार रुपये कब तक चलते। जाहिर है, किडनी बेचकर भी संगलू और मंगलू गरीबी का जाल नहीं काट पाए। उलटे गांव वाले किडनी के सौदागरों के चंगुल में फंस गए। बलिया गांव किडनी बाजार बनकर रह गया है जहां तकरीबन हर बालिग शख्स एक किडनी पर जिंदा है।
इस किडनी बाजार में खरीदी गई किडनी कोलकाता के अस्पतालों में मरीज को 10 से 12 लाख रुपये में लगाई जाती है लेकिन इसके लिए गरीबों को सिर्फ 70 से 80 हजार रुपये मिलते हैं। हालात ये है कि कोलकाता में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीज के पहुंचते ही दलालों का नेटवर्क सक्रिय हो जाता है और इसके बाद वो इस इलाके का चक्कर लगाना शुरू कर देते हैं। लोगों को बहला फुसलाकर अपनी किडनी देने के लिए कहा जाता है।

हालात ये है कि बिंडोल इलाके में एक ही परिवार के तीन-तीन लोगों ने किडनी बेच दी हैं सिर्फ इसलिए कि दो वक्त की रोटी नसीब हो सके। सूत्रों के अनुसार कोलकाता में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीज से 10 से 12 लाख रुपये लिए जाते हैं। दलाल किडनी के दाम मरीज के परिवार से तय करते हैं और फिर बिंडोल में लोगों से बात करते हैं। किडनी लेने और देने वालों के बीच चार से पांच लोगों का चैनल होता है। लिहाजा किडनी का जो मूल्य तय होता है दलालों के हाथों होते हुए बेचने वाले को पूरे एक लाख रुपये भी नहीं मिलते।

कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी किडनी बेचने के बाद दलालों के नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं और दूसरों को किडनी बेचने के लिए तैयार करते हैं। सालों से किडनी की खरीद-फरोख्त का ये धंधा बिंडोल में बदस्तूर जारी है। कानूनन किडनी बेचने के लिए लोगों को पैसे का लालच नहीं दिया जा सकता और न मजबूर किया या फुसलाया जा सकता है, लेकिन पुलिस की आंख के नीचे ये कारोबार चल रहा है। अकेले कोलकाता में हर महीने सौ किडनी का ट्रांसप्लांट होता है।

कानूनन किडनी खून के रिश्ते में दी जा सकती है या किसी खास परिस्थिति में दूसरे को दान की जा सकती है। इसके लिए सरकार की इजाजत लेनी पड़ती है। ये इजाजत अंगों के ट्रांसप्लांट के लिए बनायी गयी समिति देती है। ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन एक्ट, 1994 के मुताबिक किडनी ट्रांसप्लांट से पहले सभी नियमों का पालन जरूरी है। दान देने वाले को अनुमोदन समिति के सामने पेश होना पड़ता है और ये हलफनामा देना पड़ता है कि उसने किडनी के लिए कोई पैसा नहीं लिया है।

पश्चिम बंगाल के अलावा दूसरे राज्यों में अनुमोदन समिति सिर्फ खून के रिश्ते को ही किडनी दान की इजाजत देती है मानवीय आधार पर मिली छूट ने बंगाल में एक बाजार खड़ा कर दिया है। जहां दलाल एक हफ्ते में फर्जी कागजों पर ये साबित कर सकते हैं कि किडनी देने और पाने वाले रिश्तेदार हैं और उनके बीच पैसे का कोई लेनदेन नहीं हुआ है। ऐसा नहीं कि प्रशासन दलालों के इस नेटवर्क से वाकिफ नहीं लेकिन वो इसे तोडऩे के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है। आरोप है कि मानव अंगों का यह धंधा बगैर प्रशासन की मिलीभगत के संभव ही नहीं है। स्थानीय प्रशासन को उसका हिस्सा दलाल पहुंचा दिया करते हैं। बहरहाल जैसे ही यह खबर मीडिया की सुर्खियां बनी स्थानीय विधायक सह जिला कांग्रेस अध्यक्ष मोहित सेनगुप्त गांववालों से आकर मिले। उन्होंने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि वे उनकी हरसंभव मदद करेंगे। विधायक इसके लिए निश्चय ही बधाई के पात्र हैं किन्तु सवाल है कि वे अब तक क्या कर रहे थे। क्यों पूरा का पूरा गांव ही किडनी बाजार में तब्दील हो गया और वे कानों में तेल डाले सोते रहे। उनके अनुसार जल्द ही एक रिपोर्ट तैयार कर यहां के हालात से मुख्यंमंत्री को अवगत कराया जायेगा।

दरअसल इस पूरे मांमले का भंडाफोड़ उस वक्त हुआ जब किडनी व शरीर के अंगों के अवैध कारोबार के सिलसिले में पिछले दिनों रायगंज सदर प्रखंड के बिंडोल के निवासी शेख कुद्दुस उर्फ अब्दुल कुद्दुस को रायगंज थाने की पुलिस ने गिरफ्तार किया। उसके बाद ही किडनी तस्करी के काले कारोबार का पर्दाफाश हुआ। विधायक के साथ बातचीत में बलियादिघी, जालीपाड़ा गांव के निवासी संगलू जाल ने बताया कि आठ वर्ष पूर्व दूसरे राज्य में काम की तलाश में जाने के बाद उसका दाहिना हाथ जख्मी हुआ था। गांव लौटने पर इलाज के लिए रुपये की तलाश में संगलू एक दलाल के चक्कर में आ गया। किडनी देने के नाम पर उसे एक लाख बीस हजार रुपये देने की पेशकश की गयी। लेकिन उसे हाथ में केवल अस्सी हजार रुपये मिले। हाथ का जख्म तो भर गया लेकिन किडनी का जख्म जो लगा वह कभी भरने वाला नहीं है। किडनी निकाल दिए जाने से उसका शरीर कमजोर हो गया है। काम करने में अक्षम होने के बाद तीन बेटे बेटियों समेत पांच सदस्यों वाला उसका परिवार भुखमरी की कगार पर आ गया है। जालिपाड़ा के एक अन्य निवासी हरेन जाल ने बताया कि अभाव के चलते ही उसने दलाल की मदद से कोलकाता के एक नर्सिंग होम में जाकर किडनी बेच दी। ग्रामीणों का आरोप है कि बिंडोल गांव के किशोर क्षितेन बर्मन किडनी बेचने गया तो वापस ही नहीं आया। विधायक ने कहा कि पुलिस प्रशासन की लापरवाही व उपेक्षा के चलते इलाके में किडनी के कारोबारियों ने अपना जाल फैलाया है। जनसाधारण की अज्ञानता का लाभ उठाकर मामूली रकम देकर उनके किडनी निकाल लिए जाते हैं जिससे वे जिंदगी भर के लिए लाचार हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि किडनी तस्करी के खिलाफ वे विधान सभा के पटल पर मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट करेंगे। इस संबंध में कोलकाता के वेलव्यू हास्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सरफराज बेग कहते हैं कि किडनी या किसी भी मानव अंग की खरीद फरोख्त संज्ञेय अपराध है। किडनी सिर्फ रक्तसंबधों से जुड़े रिश्तेदारों या फिर मरने से पहले अपने अंग दान देने वालों से ही लिया जा सकता है। इसके लिए भी दो डाक्टरों की स्वीकृति का होना अनिवार्य है कि दान देने वाला व्यक्ति कुछ ही पलों का मेहमान है। उन्होंने कहा कि अगर कहीं कोई चिकित्सक इसके विपरीत कर रहा है तो यह नैतिक, मानवीय व कानूनी तीनों पहलुओं से पूरी तरह गलत है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राहुल सिन्हा ने कहा कि एक तरफ तो मुख्यमंत्री वोटबैंक बनाने के नाम पर दोनों हाथ से खैरात बांट रही हैं और दूसरी तरफ  राज्य की जनता अपना पेट पालने के लिए अपनी किडनी बेच रही है। उन्होंने व्यंग्य किया कि अगर खैरात बांटने से फुरसत मिल जाये तो मुख्यमंत्री को जरा इस पर भी गौर करना चाहिए।

बाक्स आइटम
किडनी का आनलाइन कारोबार
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब डॉ. अमित कुमार के किडनी रैकेट के पर्दाफाश से पूरे देश में सनसनी फैल गयी थी। इसे लेकर खूब हाय तौबा मचा था। धीरे धीरे मामला ठंडा हो गया। आज आलम यह है कि मानव अंग व्यापार आनलाइन बाजार खूब फलफूल रहा है। आरकुट और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल कानून को धता बता कर किडनी हासिल करने के लिए एक अहम स्रोत के रूप में खुल कर किया जा रहा है।

बद्रीनाथ वर्मा

हार की इबारत


हार की इबारत (साप्ताहिक इतवार. 29 अप्रैल )
दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की पराजय को किसी भी तरह से अनपेक्षित नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस की हार की इबारत तो उसी दिन लिखी जा चुकी थी जब स्वयं कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के विरोध के बावजूद एमसीडी के तीन हिस्से कर दिये गये थे। हालांकि इस इबारत को न तो शीला सरकार और न ही कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व समय रहते पढ़  पाया। अगर वह इसे पढ़ पाता तो शायद आज परिदृश्य कुछ दूसरा होता। हार की दूसरी वजह है हनुमान की पूंछ की तरह बेतरतीब बढ़ती महंगाई। इस बढ़ती महंगाई से हर आम ओ खास परेशान है। रही सही कसर पूरी कर दी कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने। सक्षम व समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर टिकटों की बंदरबांट हुई। इसने भी पार्टी की जीत में पलीता लगाने का काम किया। इस दौरान कांग्रेस की गुटबाजी चरम पर रही। टिकट बंटवारे से नाराज कार्यकर्ताओं ने भी अपना कमाल दिखाया और परिणाम कांग्रेस की हार के रूप में सामने आया। दरअसल, यह चुनाव परिणाम दिल्ली की शीला सरकार के कामकाज पर मतदाताओं का रोष भी अभिव्यक्त करता है। क्योंकि इस चुनाव से स्थानीय मुद्दे गायब रहे। पूरे चुनाव के दौरान दिल्ली सरकार व कुछ हद तक केेंद्र सरकार की कारगुजारियों को ही विपक्षी भाजपा ने जोरशोर से उठाया। इस तरह से इस चुनाव से स्थानीय मुद्दे गायब ही रहे। इसलिए अगर इस हार को कांग्रेस की हार के बजाय शीला सरकार की हार के रूप में देखें तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यूपी, मुंबई और अब दिल्ली तक लगातार हो रही पराजय ने कांग्रेस के कान खड़े कर दिये हैं।। इस अप्रत्याशित परिणाम ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी अचंभे में डाल दिया है। कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में चल रही गुस्से की लहर का ही परिणाम है। एमसीडी चुनाव में कांग्रेस को अपनी जीत का पक्का भरोसा था। सूत्र बताते है कि खुद भाजपा को भी अपनी इस तरह की जीत का विश्वास नहीं था। कुल मिलाकर देखा जाय तो यह कांग्रेस की हार से ज्यादा शीला दीक्षित सरकार की हार है। क्योंकि उन्हीं की मनमानियों का खामियाजा भुगतना पड़ा है कांग्रेस को। उन्होंने एमसीडी को तीन भागों में विभाजित करने की जो चाल चली वह उल्टी पड़ गयी। उनके इस निर्णय का बीजेपी समेत खुद उनकी पार्टी कांग्रेस ने भी विरोध किया था। हालांकि कांग्रेसियों का विरोध भी नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हुई। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निकट मानी जाने वाली शीला ने उनसे इस पर वीटो लगवा लिया। इसके बाद भला किस कांग्रेसी में दम था कि वह इसका विरोध करे। एमसीडी को तीन भागों में बांटने का उद्देश्य साफ था। पिछले दरवाजे से इस पर कब्जा करना। मतदाताओं को शीला सरकार की यह साजिश भी नागवार गुजरी और उसने सबक सिखाने की ठान ली। इस तरह देखा जाय तो हार की इबारत उसी दिन लिखी जा चुकी थी। भले ही कांग्रेस उसे पढऩे में चूक गयी। रही सही कसर दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती महंगाई ने पूरी कर दी। कुल मिलाकर यह कहने में झिझक नहीं है कि एमसीडी चुनाव में कांग्रेस को शीला सरकार की गल्तियों का खामियाजा भुगतना पड़ा है। एमसीडी के चुनाव परिणाम ने साफ संकेत दे दिया है कि दिल्ली की जनता शीला सरकार से खुश नहीं है। क्योंकि यह चुनाव पानी, बिजली और सड़क के मुद्दे पर नहीं लड़ा गया था। यह भाजपा की जीत उतनी नहीं है जितनी कांग्रेस खासकर शीला सरकार की हार है। एमसीडी पर काबिज भाजपा ने इस दौरान ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसे उसकी उपलब्धि कहा जा सके। हां, एक बात के लिए उसकी प्रशंसा जरूर की जानी चाहिए कि इस दौरान उसके नेताओं पर कोई बदनुमा दाग नहीं लगा जबकि इसके विपरीत शीला सरकार से लेकर केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। बढ़ती महंगाई व भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने एमसीडी चुनाव में कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए बीजेपी को अपना वोट दिया है। चुनाव परिणाम से स्पषट है कि जनता किसी भी कीमत पर कांग्रेस को जीतने देना नहीं चाहती थी। उसका विजन बिल्कुल साफ था। शीला सरकार को सबक सिखाओ। इसलिए उसने शीला सरकार के विरोध में कांग्रेस के खिलाफ वोट देकर अपना गुस्सा उतारा है। हालांकि एमसीडी चुनाव का पक्ष सिर्फ नकारात्मक नहीं है। इसके कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। इस जीत के लिए लगातार मेहनत करने वाले दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। वे लगातार सड़कों पर संघर्ष करते रहे। कभी दिल्ली भाजपा में मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा व सुषमा स्वराज जैसे कद्दावर नेताओं का वर्चस्व था। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता का राजनीतिक कद हालांकि इनकी तुलना में काफी छोटा है इसके बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत से अपनी जगह बनायी है। यह भूलना नहीं चाहिए। वे पिछले एक वर्षों से शीला सरकार की खामियां व भ््रषटाचार को लेकर मुखर थे। तो क्या यह माना जाये कि यह परिणाम विधानसभा चुनाव के पूर्व शीला दीक्षित सरकार की हार का पूर्वाभास है। या मतदाताओं की सामयिक नाराजगी का नतीजा । जो धीरे धीरे स्वत: ही समाप्त हो जायेगा। लगता नहीं है कि ऐसा होगा। क्योंकि जिस तरह के चुनाव परिणाम आये हैं उससे तो साफ संकेत मिलते हैं कि शीला सरकार अब चलाचली की बेला में है। चुनाव परिणाम आने के बाद एक सवाल राजनीतिक गलियारों में बड़े चटखारे लेकर पूछा जा रहा है कि क्या शीला दीक्षित का हश्र भी दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री रहीं व वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज जैसा होने वाला है। यानी कि क्या विधानसभा चुनाव से पूर्व शीला दीक्षित को हटाया जायेगा? ध्यान रहे कि तत्कालीन मुख्यमंत्री रहीं सुषमा स्वराज को भाजपा ने विधानसभा चुनाव के मात्र चार महीने पहले बदल दिया था। बावजूद इसके वह हार से बच नहीं पाई थीं। क्या वही इतिहास एक बार फिर दोहराया जायेगा?
                                                                                            बद्रीनाथ वर्मा मोबाइल 9718389836